जीवन के कुछ सुलझे - अनसुलझे सवालों का हल ढूंढती सब कुछ पा लेने की चाह कुछ पाकर भी छूट जाने का गम , मन हल्का होने के लिए झटपटाता और मंजिल की तलाश में ' दो राहों , तिराहों -चौराहों , मोड़ो -पड़ावों से गुजरता ह्रदय अपने भावों को नया आयाम * ज़िन्दगी " कुछ यूँ ही * है
Tuesday, 15 December 2015
31वां सृजन सम्मान : सुधाकर पाठक
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31वां सृजन सम्मान
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